परीक्षा के तनाव बचाने कार्यशाला में विशेषज्ञों ने दिए सुझाव बच्चों को आंखों से पढऩे और गढऩे की आवश्यकता

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण के आयोग अध्यक्ष यशवंत जैन ने कहा है कि परीक्षा को उत्सव के रूप में मनाए और इस उत्सव से स्कूली बच्चों को जोड़े। श्री जैन ने इस आशय के विचार राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद के परीक्षा पर्व 2.0 बच्चों में परीक्षा के तनाव को कम करने के लिए उन्मुखीकरण तथा संवेदीकरण विषय पर आयोजित एक दिवसीय कार्यशाला में व्यक्त किए। कार्यशाला का आयोजन छत्तीसगढ़ राज्य बाल संरक्षण आयोग और राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद के सहयोग से किया गया।


यशवंत जैन ने कहा कि वर्तमान में बच्चा तनाव में जी रहा है, समय प्रतियोगिता का है। बदलते परिवेश में शिक्षकों को भी बदलना होगा। उन्होंने कहा कि बच्चों को सार्वजनिक तौर पर अपमानित न किया जाए। शिक्षकों के प्रस्तुतिकरण का तरीका बच्चों के समझ में आना चाहिए। श्री जैन कहा कि बच्चों को महान व्यक्तियों के उदाहरण देते हुए समझाया जाए कि असफलता से भविष्य के दरवाजे बंद नहीं होते बल्कि सफलता के अनेक रास्ते भी खुलते हैं। उन्होंने लैंगिग अपराध अधिनियम की जानकारी देते हुए कहा कि घटना होने पर नियमानुसार कार्रवाई की जाए। सरकार द्वारा बाल कल्याण के लिए संचालित योजनाओं के जानकारी अभिभावकों को दी जाए जिससे वे इसका लाभ उठा सकें। बच्चों को बताया जाए कि अच्छा काम करने से सम्मान मिलता है।


राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष श्रीमती प्रभा दुबे ने कहा कि बच्चों के मन में झांके, परीक्षा का तनाव नियंत्रित करना शिक्षकों के हाथ में हैं। परीक्षा के तनाव को कम करना कठिन कार्य है। उन्होंने कहा कि हर बच्चे में अलग-अलग योग्यता होती है, शिक्षक उनकी योग्यता को पहचानता है। शिक्षक को बच्चों को आंखों से पढऩे और गढऩे की आवश्यकता है। शिक्षक यह प्रयास करें कि बच्चे कैसे उन्नत बने। उन्होंने बाल अधिकार संरक्षण आयोग द्वारा प्रदेश में संचालित कार्यक्रमों की जानकारी देते हुए बताया कि बच्चों को शिक्षा के लिए प्रेरित कर उनके मन से परीक्षा के दबाव को कम किया जाए। श्रीमती दुबे ने कहा कि बच्चों में परीक्षा के तनाव को कम करने के लिए इस प्रकार की कार्यशाला का आयोजन राज्य के हर जिले में किया जाएगा।


बाल मनोवैज्ञानिक डॉ. अम्बा सेठी ने पावरपांइट प्रस्तुतिकरण के माध्यम से बताया कि 95 प्रतिशत मस्तिष्क अवचेतन होता है। बच्चों के मस्तिष्क का विकास 8 वर्ष तक तेजी से विकसित होता है। शिक्षकों को बच्चों के मनोभाव को समझना जरूरी है। बच्चे नादानी करे तो उसके कारण को समझना होगा। उन्होंने कहा कि रिसर्च बताता है जिन बच्चों कि बातों को सुना जाता है वे ज्यादा सफल होते है। शिक्षक, पालक और बच्चों के बीच रिश्ता मजबूत रखें। शिक्षक और माता-पिता ही बच्चे के रोल मॉडल है, जो वह करते है वहीं बच्चा सीखता है। बच्चा यह जानना चाहता है कि मैं क्या हूं ’’निगेटिव सेल्फ एप्रोच’’ खतरा उत्पन्न करती है।

अवचेतन मन जो सीखता है उसकी छाप जीवनभर रहती है। डॉ. सेठी ने कहा कि हर बच्चे में कोई ना कोई अच्छाई होती है। बच्चों को परिणाम की नहीं उसमें छिपी प्रतिभा को पहचान कर प्रोत्साहित करें। हम सब जो करते है वह जीवन की खुशी के लिए करते है, अत: तनाव में न रहकर हर स्तर पर खुश रहें। उन्होंने कहा कि हमारा उद्देश्य है कि परीक्षा तनाव रहित हो, ज्ञान को लक्ष्य बनाए, विद्यार्थियों में आत्मविश्वास जगाना, प्रत्येक विद्यार्थी में जो सर्वश्रेष्ठ गुण है उसे बाहर लाना, विद्यार्थियों को किताबों से आगे कई और चीजें सीखाना एवं मौलिक और व्यवहारिक चिंतन की प्यास जगाना जरूरी है। संवेगात्मक बुद्धि से वह खुश रहता है। बच्चों का मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ रहना जरूरी है। चुनौतियों का सामना साहस से करे। बच्चों के प्रयास की सराहना करे प्रदर्शन की नहीं। परीक्षा के बाद विद्यार्थियों को अपनी पसंद का विषय, महाविद्यालय चुनने में मदद करे।


कार्यशाला के पैनल डिस्कशन में राज्य बाल अधिकार आयोग की सदस्य टी.आर. श्यामा, अंकित ओझा, सचिव प्रतीक खरे, स्कूल शिक्षा विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. नीलम अरोरा, मनोविज्ञानी डॉ. शाइस्ता अंसारी ने विचार व्यक्त किए। प्रशिक्षाणार्थियों के प्रश्नों के उत्तर राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष प्रभा दुबे ने दिए। राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद की अपर संचालक डॉ. सुनीता जैन ने स्वागत भाषण दिया और कार्यक्रम का संचालन डेकेश्वर वर्मा ने किया।

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